Monday, June 6, 2016

प्यासी धरती

प्यासी धरती पुकार रही है,
इन काले काले मेघों को।
अब तो बरसा दो जल तुम,
और प्यास बुझा दो मेरी तुम।

सुन करुण पुकार इस धरती की,
आकाश में मेघ छाये हैं,
जल साथ में लाये हैं।
प्यास बुझाने को धरती की,
वो आतुर हैं, वो व्याकुल हैं।

--© निशान्त पन्त "निशु"

Thursday, May 5, 2016

माँ

नौं माह गर्भ में रख कर,
रक्त से अपने पोषित कर,
कड़ी वेदना सह कर भी,
नव जीवन का निर्माण किया।
हम कर्जदार है उस माँ के,
जिसने हमको जन्म दिया।

दुनिया में आकर शिशु ने,
जो पहला शब्द उदघोष् किया,
वो करता इंगित उस स्त्री को,
जिसने हमको जन्म दिया।

"माँ" शब्द के उदघोष् मात्र से,
जिस स्त्री का मन विभोर हुआ।
हम कर्जदार है उस माँ के,
जिसने हमको जन्म दिया।

खुद भूखी रह कर जो माँ,
बच्चों की अन्नपूर्णा हुई।
गर्मी में पंखा झलकर, हमें सुलाती,
खुद स्वेद से सराबोर हुई।
हम कर्जदार है उस माँ के,
जिसने हमको जन्म दिया।

-© -निशान्त पन्त "निशु"

Sunday, May 1, 2016

जीवन में आवश्यक!

जीवन में आवश्यक हैं कुछ बदलाव।
अन्यथा जीवन में आ जायेगा ठहराव।
जीवन नाम है चलते जाना
हमेशा मुस्कुराना, गुनगुनाना।
अपनाओ हंसी और संजीदगी,
थोड़ी ख़ुशी और दीवानगी।
ठुकरा दो तुम अहम् को,
अपना लो तुम प्रेम को।
ऐसे जियो हर दिन को तुम,
जैसे हो वो अंतिम दिन।
खुशियाँ ही खुशियाँ तुम बाँटो,
ग़मों के सबको तुम हर लो।

--© निशान्त पन्त "निशु"

Friday, April 8, 2016

तथाकथित सेक्युलर नेताओं की वोटों की भूख

वोटों के भूखे तथाकथित नेताओं के ऊपर एक व्यंग्यात्मक कविता लिख रहा हूँ। वस्तुतः सभी को मेरी अन्य कविताओं की भांति पसंद आएगी। इस कविता से मेरी मंशा किसी के ह्रदय को चोट पहुँचाने की नहीं है। यह एक व्यंग्य है व्यंग्य की भांति लिया जाये।

तथाकथित सेक्युलर नेताओं की वोटों की भूख:-

ये केवल वोटों के भूखे, कपटी कुटिल शिकारी हैं।
मौके पर चौका मारने की, इनको अदभुत बीमारी है।

सूंघ कर वोटों की खुशबु, ये दौड़े चले आते हैं।
जहाँ न दिखे वोट बैंक इनको, ये अंतर्ध्यान हो जाते हैं।

इनकी महिमा का अब मैं, क्या गुणगान करूँ।
छलिया हैं ये, सबको छलते, क्या महिमागान करूँ।

जेनयू का दंगल याद है? इसमें ये सारे कूदे थे।
वोटों की भूख के पीछे, भारत माँ को भूले थे।

दादरी में वोटों के पीछे, क्या विधवा विलाप भूल गए?
मालदा के घटनाक्रम पर, ये फिर से अंतर्ध्यान हुए।

सर्वधर्म सम्मान करो तुम, पर धर्म का अपने मान रखो।
सेक्युलर बनने की खातिर, हिन्दू हित को न ताक पर रखो।

अपनी भूख मिटाने में ये, आम जन को भूल गए।
तनख्वाहें लाखों में अपनी, करके अंतर्ध्यान हुए।

--निशान्त पन्त

Sunday, February 21, 2016

आरक्षण की आग

आरक्षण की आग लगी है
देखो कोने कोने में।
सामान्य वर्ग के शोषित
बैठे हैं वीराने में।

देना है आरक्षण तो उसका
आर्थिक आधार करो।
सभी वर्गों के शोषितों
का आर्थिक उत्थान करो।

वोटों की रोटी के भूखे
इस देश के नेता हैं।
इनको तो बस जनता को
आपस में लड़ाना आता है।

सबसे मेरी विनती है
आरक्षण की न मांग करो।
आओ मिलकर जातिगत
आरक्षण को ख़त्म करो।


--© निशान्त पन्त "निशु"

Thursday, January 21, 2016

आईना

आईना हूँ, सच ही दिखाता हूँ।
इंसान नहीं, जो फितरत बदल लूँ।

-- निशान्त पन्त "निशु"

Wednesday, November 4, 2015

तथाकथित असहिष्णुता - व्यंग्य

राजनीति से प्रेरित होकर असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर पुरुस्कार वापस करने वाले तथाकथित लेखकों, साहित्यकारों, नेताओं, अभिनेताओं व अन्य पर एक व्यंग्यात्मक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ संभवतः मेरी अन्य कविताओं की भातिं ही आप इसे पसंद करेंगे।

तथाकथित असहिष्णुता - व्यंग्य

सोचो उन पर क्या बीती है,
पीछे पच्चीस सालों में।
दूर हुए वो जन्मभूमि से,
भटके दर दर सालों में।

तब कहाँ थे ये नेता-अभिनेता
जब लूटी गयी अस्मत अबलाओं की।
तब कहाँ थे ये साहित्यकार,
जब हुए थे 'उन' पर अत्याचार।

मूक बधिर से बैठे थे तब,
ये तथाकथित से माननीय।
तब असहिष्णुता कहाँ गयी थी,
जब हत्या हुई थी लाखों की।

राजनीति से प्रेरित हैं,
कपटी कुटिल ये माननीय।
देश की साख बिगाड़ने को,
आतुर हैं ये माननीय।

कैसे बैठे हो तुम
अपने घर में सुकून से।
जब कश्मीरी पंडित हैं,
दूर अपने कुटुंब से।

बाज़ नहीं आते हो तुम,
अपने कुटिल विचारों से।
करते हो राजनीति तुम,
मासूमों की लाशों पे।

-- © निशान्त पन्त "निशु"