Thursday, August 16, 2018

अटल बिहारी वाजपेयी जी को समर्पित कविता "अटल"

हिमालय से वो अटल,
भागीरथी से सरल,
निर्मल था जिनका हृदय,
ऐसे थे हमारे अटल।

राह थी भले कठिन,
रुके नहीं, थमे नहीं,
मन मे देश प्रेम था,
ऐसे थे हमारे अटल।

देश सेवा के लिये,
सर्वत्र अर्पित कर दिया,
बहुमूल्य जीवन दे दिया,
ऐसे थे हमारे अटल।

देशप्रेम कूट कूट,
कर भरा था हृदय।
रक्त की एक एक बूंद,
में बसी थी माँ भारती।

ऐसे थे हमारे अटल।


यह कविता "भारत रत्न" स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को समर्पित है।

-© निशान्त पन्त "निशु"

Sunday, June 3, 2018

क्यूँ

लिखूं या न लिखूं,
ये सोचता हूँ क्यूँ?
चलूँ या न चलूँ,
ये सोचता हूँ क्यूँ?
रहूँ या न रहूँ,
ये सोचता हूँ क्यूँ?

बस ये "क्यूँ" ही क्यूँ?

क्यूँ ये जीवन आधार है,
इसी क्यूँ को सोचने में,
दिन ये ढल जाता है क्यूँ?
सुहानी शाम आती है क्यूँ?
अंधेरा पसर जाता है क्यूँ?
निशा छा जाती है क्यूँ?
बस इसी सोच में,
भोर हो जाती है क्यूँ?


-साभार
© निशान्त पन्त "निशु"

Sunday, February 11, 2018

"मैंने जीना सीख लिया"

हृदय पटल पर सुंदर स्मृति,
फिर सजीव हो जाती है।
जब तस्वीर तुम्हारी,
सामने आ जाती है।

हो उठता है व्याकुल हृदय,
अश्रु धार बह जाती है।
जब जब इस हृदय में,
याद तुम्हारी आ जाती है।

आशाओं का वृक्षारोपण,
करके जीना सीख लिया।
तुम को यादों में रख कर,
मैंने जीना सीख लिया।

न तेरा दोष है,
न मेरा दोष है।
दोषी तो केवल परिस्थिति,
जिस कारण से वियोग हुआ।

आशाओं का वृक्षारोपण,
करके जीना सीख लिया।
तुम को यादों में रख कर,
मैंने जीना सीख लिया।

- © निशान्त पन्त "निशु"

Sunday, January 28, 2018

कल्पना

सुबह तुम्हारा अंगड़ाई लेना,
फिर मुझसे गले लग जाना।
नर्म होठों से अपने,
मेरे हृदय को छू जाना,
बड़ा अच्छा लगता है।

तुम्हारा अधरों से अपने,
मेरे अधरों को छू लेना,
बड़ा अच्छा लगता है।

तुम्हारी गर्म सांसो का,
मेरे चेहरे को छू जाना,
बड़ा अच्छा लगता है।

बाहों में बाहें डाल कर,
साथ बैठे रहना,
बड़ा अच्छा लगता है।

काश तुम अभी मेरे पास होती,
यह कल्पना करना ही,
बड़ा अच्छा लगता है।

- © निशान्त पन्त "निशु"

Sunday, September 3, 2017

सुकून ऐ इश्क़

सुकून ऐ इश्क होता है नसीब, नसीब वालों को।
वरना इश्क तो हर इंसा किया करता है।

-© निशान्त पन्त "निशु"

Monday, June 26, 2017

तुम

दिल में तुम हो,
दिमाग में तुम हो,
मेरी धड़कन भी तुम हो,
मेरी प्यास भी तुम हो,
मेरी भूख भी तुम हो।

मेरी सुबह भी तुम हो,
मेरी शाम भी तुम हो,
मेरा दिन भी तुम हो,
मेरी रात भी तुम हो।

मेरा सब कुछ तुम हो,
मेरा हर पल तुम हो,
मेरा चैन भी तुम हो,
दिल का करार भी तुम हो।

दिल में तुम हो,
दिमाग में तुम हो,
मेरी धड़कन भी तुम हो।


-© निशान्त पन्त "निशु"

Sunday, March 12, 2017

#उत्तराखंड_देवभूमि_चुनाव_नतीजे_२०१७ पर मेरा व्यंग्य बाण

चले बाघ, बकरी चराने
जिनकी थी सबको चाहत
देशवासियों उस युगपुरुष को
सब कहते थे हरीश रावत।

बेकार हुआ सब दावँ पेच,
जब जनता ने मतदान किया।
नतीजा जब निकला चुनाव का,
सबका घमंड, छिन्न-भिन्न हुआ।

दावँ पेच के बड़े खिलाड़ी,
थे जोड़ तोड़ के बाहुबली।
जनता ने जब दम्भ भरा,
चहुँओर मच गयी खलबली।

जन-जन के हित रखे ताक पर,
न दिया कभी किसी को सम्मान।
जनता ने जब मतदान किया,
तब टूट गया सबका अभिमान।


-निशान्त पन्त 'निशु'